घाटीयां
ऐ घाटीयाँ कश्मीर की,एहसान क्या किया
कर्तव्य जो हमारा वो अधिकार है दिया
जन्नत का जो मंजर तुम्हारी वादीयो में हैं
झील के किनारे चिनारों बहार हैं
महके हुए केसर फ़िजां में चारों ओर है
इसने सिखाई प्यार की ये मीठी बोलियाँ
कर्तव्य जो हमारा वो अधिकार है दिया
कश्मीर की जमीनपे पीरो का आशियां
भजनों का खजाना है और ढंग सुफियां
उतरे हुए फ़रिश्तों की पावन पहाड़ियाँ
कुदरत ने भी यहां पे अपना सर है झुकाया
कर्तव्य जो हमारा वो अधिकार है दिया
व्यक्तित्व को सँवारने में गलतियाँ हुई
आड़े जो कल से धर्म की सीमाये आ गयी
कितने जुलुम है ढायें नहीं कोई गिनतियाँ
कर्तव्य जो हमारा वो अधिकार है दिया
© मृणाल घाटे
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